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शिरडी वाले साईं बाबा की जीवन कथा(shirdi wale sai baba ki jeevan katha)

शिरडी वाले साईं बाबा की जीवन कथा ( shirdi wale sai baba ki jeevan katha)

शिरडी वाले साईं बाबा की जीवन कथा(shirdi wale sai baba ki jeevan katha) बड़ा ही रोचक और चमत्कार से भरा था। शिरडी के श्री साईं बाबा सभी के है। इनके दरबार में अमीर, गरीब और सभी जात -धर्म के लोग एक सामान है। शिर्डी को हिंदुओं और मुस्लिमों के लिए एक पावन स्थल माना जाता है। हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई लगभग सभी धर्मों को मानने वाले लोग साई बाबा के अनुयायी हैं।

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शिरडी के साईं बाबा का बचपन

श्री साईं बाबा का जन्म वर्ष 1835 में महाराष्ट्र के पाथरी (पातरी)  के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था।
जब वह 5 साल के थे तब उनके माता-पिता ने उन्हे एक फकीर के हवाले कर दिया था। ये साई बाबा ने अपने जीवन के अंतिम दिनों में बताए थे। लेकिन जन्म की तारीख अभी भी किसी को ज्ञात नहीं है। विभिन्न जाति और समुदाय के लोग कहते हैं कि बाबा उनके जाती या समुदायों के हैं परन्तु इसका कोई भी ठोस प्रमाण नहीं है।

शिरडी में साईं बाबा का जीवन

बाबा पहली बार 16 साल की उम्र में महाराष्ट्र के शिरडी गाँव आए थे। लोग उन्हें देखकर आश्चर्यचकित रह गए थे कि इतने कम उम्र का एक लड़का नीम के पेड़ के नीचे आसन लगाकर बिना भोजन और पानी के गहरी साधना में लीन थे। इससे युवा साई बाबा के बारे में जानने के लिए लोगों में उत्सुकता बढाती गयी। सिरडी के ग्राम प्रधान की पत्नी बैजाबाई साईं बाबा के बारे में लोगों से हालचाल पूछती रहती थी। धीरे-धीरे वह बाबा के लिए प्रति दिन खाना स्वयं लाने लगी। बाबा ने बैजाबाई को अपनी माँ के रूप में मानना ​​शुरू कर दिया। ग्राम के प्रमुख और एक पुजारी मल्हस्पति ने एक बार खंडोबा से कहा कि यहां एक पवित्र आत्मा है जो साईं बाबा की ओर इशारा करती है।

एक बार बाबा ने नीम के पेड़ की ओर इशारा किया और इसे जड़ों तक खोदने को कहा। ग्रामीणों ने बाबा के आज्ञा का पालन किया और उसे खोदना शुरू कर दिया। कुछ अंदर तक खोदने के बाद , उन्होंने पाया कि पत्थर से बना एक स्लैब, बिना तेल और हवा के जलने वाला दीपक है, जो विज्ञान के नियमों का बिलकुल प्रतिकूल था। उसी स्थान पर उन्हें एक बर्तन मिला जो लकड़ी की मेज पर गाय के मुंह के आकार का है। बाबा ने स्पष्ट किया कि यह वही पवित्र स्थान है जहाँ उनके गुरु ने तपस्या की थी। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि मेरी (साईं बाबा) पूजा करने के बजाय पेड़ की पूजा करें और उसे अछूता छोड़ दें। आज तक किसी ने उसे छुआ तक नहीं। यह पेड़ शिरडी जाने वाले तीर्थयात्री का पहला पड़ाव है।

बाबा एक अद्वितीय व्यक्तित्व के थे, जिन्होंने उनकी ओर ध्यान से देखा उनसे आकर्षित होते गए, वह किसी से नहीं डरते थे। कुछ लोग उन्हें पागल मानता था और यहां तक ​​कि उन पर पत्थर फेंककर शारीरिक चोट पहुंचाता था। प्रारम्भ में बाबा ने शिरडी में लगभग 3 साल बिताए। इसके बाद, एक वर्ष की अवधि के लिए बाबा ने शिरडी से चले गए और उस दौरान की साईं बाबा के बारे में बहुत कम जानकारी है। उन्होंने कई संतों, फकीरों से मुलाकात की और यहां तक ​​कि बुनकर के रूप में काम किया।

वर्ष 1858 में, बाबा स्थायी रूप से शिरडी लौट आए। लगभग पांच साल तक बाबा ने नीम के पेड़ के नीचे ही रहे और अक्सर बाबा शिरडी के पास जंगल में भटकते पाए जाते थे, बाबा अपना अधिकांश समय पूजा और ध्यान में बिताते थे। धीरे-धीरे बाबा पास की एक मस्जिद में जाकर रहने लगे। कई हिंदू और मुसलमान धर्म के लोग बाबा के दर्शन करने आते थे। मस्जिद में बाबा ने पवित्र अग्नि जला के रखते थे जिसे धूनी कहा जाता था। बाबा ने सभी आगंतुक को धूनी का पवित्र भस्म (राख) देते थे। लोगों का मानना ​​था कि इस पवित्र भस्म (राख) को लगाने से सभी शारीरिक परेशानी दूर हो जाती है असाध्य रोग भी ठीक हो जाते हैं।

बाबा सभी के थे और वो सभी धार्मिक उत्सव में भाग लेते थे। बाबा को खाना पकाने का शौक था और वह खाना वहां आने वाले भक्तों में “प्रसाद” के रूप में वितरित किया जाता था। बाबा खाली समय में भजन (धार्मिक) गाते और नृत्य करते थे। कई लोग मानते थे कि बाबा एक संत थे तो कई लोगों के दृष्टि में वो एक भगवान के रूप थे । जैसे-जैसे समय बीतता गया शिर्डी में आने वाले भक्तों की संख्या बढ़ती गयी।

शिरडी के साईं बाबा का धार्मिक दृश्य

बाबा पूरी तरह से रूढ़िवादिता के खिलाफ थे, वो हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सबके थे। बाबा ने अपने भक्तों को एक साधारण जीवन जीने के लिए प्रोत्साहित करते थे। उन्होंने अपने अनुयायियों को अपने अपने धर्म के अनुकूल सभी परंपरा निर्वहन करने की सलाह देते थे। उन्हें अपने धर्म के अनुसार पवित्र ग्रन्थों का अध्ययन करने की सलाह देते थे। उन्होंने सभी हिंदू रीति-रिवाजों का पालन किया था और मुस्लिमों को त्यौहार के समय नमाज पढ़ने, कुरान पढ़ने की सलाह देते थे।

उनके प्रसिद्ध सुलेखों में से एक, “सबका मलिक एक” (“एक ईश्वर सभी पर शासन करता है”)।

उन्होंने हमेशा “अल्लाह मलिक है” कहा।

दान के प्रति साई बाबा का दृष्टिकोण

बाबा ने हमेशा दान को प्रोत्साहित किया।
यदि कोई भी आप से मदद मांगता है तो उसे दूर न भगाएं। उन्हें सम्मान दें और उनके साथ अच्छा व्यवहार करें।
प्यासे को पानी दें, भूखे को भोजन दें, और अजनबी को अपने बरामदे में रहने की जगह दें।
अगर किसी ने आपसे कुछ मांगे और आप देने के लिए इच्छुक नहीं हैं, तो न दें, लेकिन अनावश्यक रूप से उसे कुछ नहीं कहें ।
बाबा ने हमेशा कहा कि हर जीव से बिना किसी भेदभाव के प्रेम करना चाहिए।
उन्होंने ईश्वर (अल्लाह मलिक) के शक्ति पर पूर्ण निष्ठा और विश्वास रखने की सलाह दी साथ ही आशीर्वाद और परिणामों के लिए धैर्य रखने को कहा।
बाबा की कृपा से, उनके भक्तों में आशा और विश्वास दिखाई देता है। उनकी जो भी इच्छाएँ और आकांक्षाएँ होती है वो सभी पुरे होते है। बाबा किसी को निराश नहीं करते ।
बाबा का दिव्य प्रेम और आशीर्वाद सीधे भक्तों तक पहुँचता है उसे किसी भी मध्यस्थ के माध्यम की जरुरत नहीं होती है ।
उन्होंने शिरडी आने वाले भक्तो से दक्षिणा (पैसा) भी लिया , जिसे वह अपने शिष्यों और जरुरतमंदों में वितरित करते थे ।
साईं बाबा से जो आशीर्वाद लेने आते थे कभी भी उनको मदद और मार्गदर्शन करने के लिए तत्पर रहते थे।

शिरडी साईं बाबा के भक्त और शिष्य

महलस्पति- एक स्थानीय मंदिर के पुजारी को शिरडी के साईं बाबा का पहला भक्त माना जाता है। प्रारंभ में साईं के भक्त शिरडी में रहने वालों का एक छोटा समूह और कुछ लोग देश के दूसरे हिस्से के थे। अब शिरडी वाले साईं बाबा के भक्तों की संख्या करोड़ों में है। दुनिया के विभिन्न देशों में शिरडी के साईं बाबा की पूजा की जा रही है।

सबसे पहले हिंदुओं ने उन्हें अनुष्ठानों के साथ पूजा की और मुसलमानों ने उन्हें संत माना। बाद में ईसाई और पारसी भी बाबा की पूजा करने लगे।

लॉर्ड मेहर बाबा का जन्म पारसी परिवार में हुआ था। वह अपने जीवन काल में एक बार साईं बाबा से शिरडी में साईं बाबा के जुलूस के दौरान मिले थे। मेहर बाबा के लिए यह सबसे यादगार क्षण है लेकिन मेहर बाबा की उपस्थिति का श्री साई सच्चरित्र में कोई उल्लेख नहीं है, लेकिन मेहर बाबा के जीवन इतिहास में शिरडी साईं बाबा के कई संदर्भ मिलते हैं ।

साईं बाबा के उल्लेखनीय शिष्य हैं जिन्हें साईं बाबा के समान प्रसिद्धि मिली। जैसे कि सकोरी के उपासनी महराज। नाना साहेब चांदोरकर, गणपत राव सहस्रबुद्धे, तात्या पाटिल, बैजा माई कोटे पाटिल, हाजी अब्दुल बाबा, माधव राव देशपांडे, गोविंदराव रघुनाथ दाभोलकर, महालसपति चिमनजी नागरे, राधाकृष्ण माई को साईं बाबा के प्रसिद्ध भक्त के रूप में माना जाता है।

शिरडी साईं बाबा के चमत्कार

शिरडी के साईं बाबा द्वारा कई चमत्कार देखने को मिला। उन्होंने कई चमत्कार किए जैसे कि लोगों के मन को पढ़ना, अपनी मर्जी से कब्र में प्रवेश करना, शरीर के अंगों को निकालना और उन्हें फिर से जोड़ना। 3 दिनों के बाद पुनर्जन्म लिया, बीमार को ठीक किया, और गिरती मस्जिद को रोककर लोगों को बचाया।

शिरडी साईं बाबा द्वारा शिरडी में सैकड़ों चमत्कारों की सूचना है। लोगों का मानना ​​है कि साईं चरित को पढ़ने से परिवार में सभी प्रकार की समस्यायें दूर होती है और सभी के स्वास्थ्य अच्छे रहते हैं ।

भक्त अक्सर कहते हैं कि शिरडी साईं बाबा ने उन्हें भगवान राम, कृष्ण आदि के रूप में दर्शन दिए, उनके अनुयायियों द्वारा साईं बाबा की शिर्डी पर कई कहानियाँ लिखी गईं। वे कहते हैं कि साईं बाबा सपने में आते हैं और उन्हें सलाह देते हैं कि क्या करें और क्या न करें।

पवित्र विभूत (राख) जो साईं बाबा के दर्शन करने वाले भक्तों को दिया जाता है , सभी रोगों को दूर करता है ।

शिरडी साईं बाबा के जीवन पर कई सिनेमा बने हैं :

शिरडी साईं बाबा पर बने फिल्मों के मुख्य उद्देश्य मुनाफा कमाना नहीं था वल्कि भक्त (जो सिनेमा का निर्माण किया) वो साईं बाबा के प्रति अपने विश्वास और भक्ति के लिए सिनेमा बनाया। साईं बाबा के शिर्डी के जीवन इतिहास पर बहुत सारी फिल्में बनी हैं

शिरडी के साईं बाबा (हिंदी)
ईश्वर अवतार साईं बाबा (हिंदी)
मलिक इक (हिंदी)
शिरडी साईं बाबा (हिंदी)
शिरीद चे साईं बाबा (मराठी)
साईं बाबा (मराठी)
भगवान श्री साई बाबा (कन्नड़)
श्री शिरडी साईं बाबा महात्म्य (तेलुगु)
श्री साई महिमा (तेलुगु)
शिरडी साई (तेलुगु)

इन सभी फिल्में साईं बाबा के जीवन , और उनके चमत्कारों के बारे में दिखाया गया है।

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