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श्री राम वंदना : भए प्रगट कृपाला (Shri Ram Vandana : Bhaye Pragat Kripala)

त्रेतायुग में भगवान विष्णु के राम के रूप में पृथ्वी पर प्रगट होने के क्षण का विवरण तुलसी कृत रामचरित मानस में छंद के रूप में किया गया है। इस पवित्र राम वंदना :भए प्रगट कृपाला (Ram Vandna: Bhaye Pragat Kripala) का पाठ करने से प्राणी के मन में अद्भुत निर्मलता का संचार होता है। उसका काया निर्मल होता है। और भगवान राम की विशेष अनुकम्पा प्राप्त होती है।

चैत्र का पवित्र महीना था। शुक्ल पक्ष के नवमी तिथि थी। दोपहर का समय था। विष्णु के प्रिय अभिजित मुहूर्त था। न ही ज्यादा सर्दी थी न ही बहुत गर्मी। सभी को पसंद आने वाला पवित्र क्षण था।

मंद मंद शीतल हवा चल रहा था। देवता प्रसन्न थे। संतों के मन में उत्सुकता थी। वन पुष्प आच्छादित थे। पर्वत श्रंखला मणियों के समान जगमगा रहे थे। सभी नदियों में अमृत की धारा बह रही थी ।

ब्रह्मा समेत सारे देवता अपने विमान सजा-सजाकर चल पड़े। निर्मल आकाश देवताओं से भर गया। देव गंधर्व गण स्तुति करने लगे।

और अपने शुभ हाथों में पुष्प भरकर बरसाने लगे। आकाश में वाद्ययंत्र गूंजने लगे। नाग, मुनि और देवता श्री प्रभु की स्तुति करने लगे और अपने अपने तरीके इस विशेष अवसर में सेवा देने लगे ।

गरीव दीन -दुखियों को उद्धार करने वाला, कौसल्या के पुत्र के रूप में लोगों के भलाई के लिए प्रभु श्री राम  प्रगट हुए ।

श्री राम वंदना : भए प्रगट कृपाला (Shri Ram Vandana : Bhaye Pragat Kripala)

भए प्रगट कृपाला, दीनदयाला, कौसल्या हितकारी।
हरषित महतारी, मुनि मन हारी, अद्भुत रूप बिचारी॥

लोचन अभिरामा, तनु घनस्यामा, निज आयुध भुजचारी।
भूषन बनमाला, नयन बिसाला, सोभासिंधु खरारी॥

कह दुइ कर जोरी, अस्तुति तोरी, केहि बिधि करूं अनंता।
माया गुन ग्यानातीत अमाना, वेद पुरान भनंता॥

करुना सुख सागर, सब गुन आगर, जेहि गावहिं श्रुति संता।
सो मम हित लागी, जन अनुरागी, भयउ प्रगट श्रीकंता॥

ब्रह्मांड निकाया, निर्मित माया, रोम रोम प्रति बेद कहै।
मम उर सो बासी, यह उपहासी, सुनत धीर मति थिर न रहै॥

उपजा जब ग्याना, प्रभु मुसुकाना, चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै।
कहि कथा सुहाई, मातु बुझाई, जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै॥

माता पुनि बोली, सो मति डोली, तजहु तात यह रूपा।
कीजै सिसुलीला, अति प्रियसीला, यह सुख परम अनूपा॥

सुनि बचन सुजाना, रोदन ठाना, होइ बालक सुरभूपा।
यह चरित जे गावहिं, हरिपद पावहिं, ते न परहिं भवकूपा॥

भए प्रगट कृपाला, दीनदयाला, कौसल्या हितकारी।
हरषित महतारी, मुनि मन हारी, अद्भुत रूप बिचारी॥

** श्री राम, जय राम, जय जय राम **